पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, बुद्धि जीवियों द्वारा बौद्धिक क्रांति के लिये संगठन
Total Pageviews
Friday, June 8, 2018
बौद्धिक संघ, भारत : बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय
बौद्धिक संघ, भारत : बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय: बौद्घिक संघ, भारत एक स्वैच्छिक सामाजिक बुद्धि जीवियों का संगठन है । इसके अंतर्गत " घरेलू पुस्तकालय योजना " संचालित है...
बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय
बौद्घिक संघ, भारत एक स्वैच्छिक सामाजिक बुद्धि जीवियों का संगठन है । इसके अंतर्गत " घरेलू पुस्तकालय योजना " संचालित है । बौद्घिक संघ, भारत केवल प्रेरणा देने का कार्यक्रम चलाता है जिससे लोग अपने घर, परिवार को ग्यान के प्रकाश से आलोकित कर दें । विभिन्न परिवार तरह तरह के कर्मकांडों, रीतिरिवाजों में उलझ कर बौद्धिक उन्नति से दूर हो जाते हैं जब कि जब कभी वे स्वयं स्कूल, कालेज गये थे तो इन्हीं पुस्तकों के सहारे बढ़े थे । लेखनी थाम कर, कलम पकड़ कर ग्यान के प्रकाश को देखा था, पर सब भूल गये रोजी रोटी और कर्मकांडों के चक्कर में ।
बौद्घिक संघ, भारत यह कभी नहीं कहता कि सारे कर्मकांड बेकार हैं, नहीं करने चाहिये । हां यह जरूर कहता है कि आस्था के नाम पर कुछ भी, कभी भी करने के पहले वैग्यानिक दृष्टि से भी समझें , तब करें । अनावश्यक समय न बरबाद करें । जिस कलम ने आपको शिक्षा दी, लिखना सिखाया उसको भुला कर न जाने किसकी किसकी पूजा करने लगे, आराधना करने लगे, वन्दना करने लगे । देवी देवताओं का क्या योगदान रहा? चिन्तन करें तो सही । यह आपकी मान्यताएँ भर हैं । सनातनी धर्म, बुद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाई, सिख सब अलग अलग पूजा पद्धतियों में लगे हैं लेकिन कोई भी धर्म, सम्प्रदाय हो सबकी कलम एक है लेखनी एक है । तो पूजा ही करनी है, वन्दना ही करनी है तो लेखनी की करिये, कलम की करिये । पुस्तकों को घर में सजायिये, पढ़िये । ग्यान लीजिये, दीजिये । "घरेलू पुस्तकालय " बनाइये ।
क्या करना है जरा सा यह भी समझ लें । जैसे लेखक, कवि के घर में पुस्तकें जरूर होती हैं वैसे ही आप अपने शयन कक्ष, बैठक कक्ष या ड्राइंग रूम में कम से कम एक अलमारी और रैक में कुछ पुस्तकें, पत्रिकायें, समाचार पत्र, यदि हो सके टैबलेट, आईपैड, लैपटॉप, कम्प्यूटर जरूर रखें । एक कलम दान कुछ कलमें रखें और कुछ सादे कागज, रजिस्टर आदि लिखने के लिये । यहां 24 घंटे में कम से कम एक घंटे बैठ कर चिन्तन, पठन, लेखन आदि करें । यही सबसे बड़ी साधना है, उपासना है । फिर भी आप पूजा पाठ करने वाले हैं और बिना उसके अधूरा सा लगता है तो इन पुस्तकों को प्रतिदिन एक दीपक दिखा दें, जला दें, अगर बत्ती जला दें । लेखनी की वन्दना कर दें ।
ग्यान कांड और कर्मकांड दोनो से गये साथ ही भक्ति कांड भी । घर घर पुस्तकालय से बौद्घिक प्रगति तेजी से होगी । नई नई पुस्तकें लिखी जांयेगी, पढ़ी जांयेगी । पुस्तक क्रांति होगी । देश को ग्यान के उच्च शिखर पर ले जाना है तो बौद्धिक संघ, भारत की घरेलू पुस्तकालय योजना को अपनाना है ।
प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी रुचि के अनुसार, जरूरत के अनुसार पुस्तकें, पत्रिकायें रख सकता है । समय समय पर बदल सकता है । देखते देखते छोटा सा घरेलू पुस्तकालय आपको पाठक से लेखक बना सकता है । आपके व्यवसाय में, नौकरी में चार चांद लगा सकता है । समाज मे एक सम्मान जनक स्थान दिला सकता है । एक बौद्घिक क्रांति ला सकता है । घर घर में हुई बौद्घिक क्रांति पूरे समाज, देश में बौद्धिक क्रांति पैदा कर देगी ।
जय हिन्द! जय भारत!! जय बौद्घिक संघ !!!
***************************
राजकुमार सचान "होरी "
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
Facebook /bauddhiksangh
Thursday, June 7, 2018
किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर (भाग2)
किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर --लेख के प्रथम भाग में इस बात का उत्तर दिया था कि आंदोलन करने वाले किया तो सूट बूट में हैं । इसी को आगे बढ़ाते हैं । कुछ देखने वालों ने यहां तक कहा कि आंदोलनकारी बड़ी बड़ी गाड़ियों में आये ये किसान नहीं हो सकते । ये नेता हैं जो विपक्षी पार्टी के हैं ।
दुनियांमे बहुत सारे आंदोलन होते हैं जिनमे आंदोलन करने वाले तो होते ही हैं साथ में उनसे सहानुभूति रखने वाले भी आ जाते हैं । यह किसानों के आंदोलन में भी हो रहा है । पर कुछ शहरी, कुछ सत्ता के पक्षधर ऐसे पेश आये किसानों से कि सिद्ध हो गया कि उनको कथित अन्नदाता से सहानुभूति तो दूर बल्कि नफरत यहां तक है कि जो उनसे सहानुभूति व्यक्त करने जायें वे भी बुरे । क्या किसान जिसको दिखावटी ही सही तुम अन्नदाता कहते हो को बुरे दिनों में, संघर्ष में साथ देना बुरा है? पाप है?
होना तो यह चाहिये था कि जिसको देश अपना अन्नदाता मानता है उसे आंदोलन ही न करना पड़ता और अगर करना पड़ा तो सत्ता पक्ष और विपक्ष आगे आ कर बढ़ चढ़ कर साथ देता । कम से जो मजाक उड़ाया गया, भावनात्मक चोट पहुंचायी गयी वह तो न होता । क्या जो आंदोलन में साथ दे रहे थे और किसान नहीं थे कोई कानून है कि वे साथ देने नहीं आ सकते थे? या अगर आते भी तो पैदल आते अपनी मोटरसाइकिल, कार, बस से न आते?? यह सोच गिरावट की पराकाष्ठा है । किसान का लगता है कोई नहीं । उसके संगठनों में ताकत नहीं ।
आंदोलन की एक अन्य प्रतिक्रिया है कि सच्चा किसान अपनी सब्जियां, दूध, अनाज सड़कों पर फेंक नहीं सकता । ये किसान हो ही नहीं सकते । ये फर्जी हैं । किसी न किसी राजनैतिक दल के लोग हैं, नेता हैं । सामान्य दिनों मे किसान ही क्या कोई भी अपनी खून पसीने की कमाई बरबाद नहीं कर सकता, सड़कों में फेंक नहीं सकता । परन्तु आलोचना करने वाले यह भूल गये कि किसान की आमदनी न होने से कितना पीड़ित है, दुखी है । हर साल हजारों की संख्या में आत्महत्या करता है तो क्या ऐसी भयंकर स्थिति में वह कुछ भी उन्माद में नहीं कर सकता?
उन्माद में व्यक्ति तो सब होश हवास भूल कर पहले अपने प्यारे बच्चों को, पत्नी को मार कर खुद भी आत्महत्या कर बैठता है । ये तो केवल अपना सामान सड़कों में फेंकना तक था । एक किसान एक जगह अनशन पर बैठा और मर गया । यह क्या है ? अरे शहरी बाबुओं, किसान विरोधियों! कुछ तो लिहाज करो, शर्म करो, अगर किसान का पैदा किया हुआ कुछ भी खाते हो । किसान की हाय से बचो । जिस देश ने अपने किसानों, अन्नदाताओं का पेट नहीं भरा वह कभी पनप ही नहीं सकता । देश के किसान को उसकी फसल का पैसा न दे कर विदेश से अनाज, सब्जियां, चीनी आदि खरीद कर किसान के पेट मे लात मारना कभी किसी के लिए सुखकर नहीं हुआ ।
किसानों की पीड़ा सरकारें समझें तो पर दलगत राजनीति और शहरी समाज समझने नहीं देता जिनको किसानों का दु:ख, दर्द बनावटी और ढोंग लगता है । किसानों के पास आज कोई टिकैत नहीं है । आंदोलन तो आज नहीं कल खत्म होगा ही पर किसान के विरोधियों ! अपने लिये नर्क मत तैयार करो । किसान से भी यही विनती है कि वह देखे कि घाटे की खेती कब तक करेगा? शहरी तो एक दो साल भी खेती न करेगा जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी वह कर रहा है ,मर रहा है । ----------------
( क्रमश: आगे जारी)
***************************
राजकुमार सचान होरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
भारतीय साहित्य अकादमी का ट्रेड मार्क रजिस्टर्ड
बौद्घिक संघ, भारत के अधीन चार मुख्य आनुषंगिक संगठन हैं ---
1 भारतीय साहित्य अकादमी
2 भारतीय पत्रकार संघ
3 पिछड़ा वर्ग लेखक संघ
4 भारतीय काव्य धारा
इनका विवरण वेब साइट www.bauddhiksangh.com में है ।
साहित्य अकादमी भारत सरकार की संस्था है और हिन्दी साहित्य अकादमी दिल्ली सरकार की । लेकिन भारतीय साहित्य अकादमी अपनी बौद्घिक संघ, भारत के अधीन संस्था है जिसका ट्रेड मार्क रजिस्रट्रेशन भारत सरकार के ट्रेड मार्क विभाग, मुम्बई से हो कर आ चुका है । इस नाम का टीएम और (आर) अब अपने पास है । बधाई समस्त को ।
इस वर्ष के भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार अपनी संस्था से दिल्ली में दिये जायेंगे । प्रविष्टियां शीघ्र मांगी जायेंगी ।
राजकुमार सचान होरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
1 भारतीय साहित्य अकादमी
2 भारतीय पत्रकार संघ
3 पिछड़ा वर्ग लेखक संघ
4 भारतीय काव्य धारा
इनका विवरण वेब साइट www.bauddhiksangh.com में है ।
साहित्य अकादमी भारत सरकार की संस्था है और हिन्दी साहित्य अकादमी दिल्ली सरकार की । लेकिन भारतीय साहित्य अकादमी अपनी बौद्घिक संघ, भारत के अधीन संस्था है जिसका ट्रेड मार्क रजिस्रट्रेशन भारत सरकार के ट्रेड मार्क विभाग, मुम्बई से हो कर आ चुका है । इस नाम का टीएम और (आर) अब अपने पास है । बधाई समस्त को ।
इस वर्ष के भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार अपनी संस्था से दिल्ली में दिये जायेंगे । प्रविष्टियां शीघ्र मांगी जायेंगी ।
राजकुमार सचान होरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
Wednesday, June 6, 2018
किसानों के लिये अर्ज किया है
वे जानते हैं कि घाटा ही घाटा है खेती में,
तभी तो शहरी लाट साहब खेती नहीं करते ।
*********
कभी किसान पहने हो सलीके से कपड़े,
शहरी बाबुओं के सीने में सांप लोट जाते हैं ।
********
तू फटेहाल रह, कर चाहे खेतों में खुदकुशी,
होरी यही नियति है ,तू भारतीय किसान है ।
*********
तेरे संघर्षों में साथ दे कोई गवारा नहीं,
अजीब लोग हैं ये, ये ही अन्नदाता कहते हैं ।
**************************/**
राजकुमार सचान "होरी "
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
Tuesday, June 5, 2018
बौद्धिक संघ, भारत : देवालय नहीं, पुस्तकालय
बौद्धिक संघ, भारत : देवालय नहीं, पुस्तकालय: देवालय नहीं पुस्तकालय पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं / यद्यपि अब डिजिटल युग में ज्ञान के नए नए स...
किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर
इस बार का किसान आंदोलन हो या किसी समय का उस पर कैसी कैसी प्रतिक्रियायें होती हैं, यह देखना, समझना बहुत जरूरी है और अनिवार्य भी । इन प्रतिक्रियाओं की मूल भावना से आपको किसान का दु:खद जीवन क्यों है और उसकी समस्यायें बदस्तूर क्यों बनी हुई हैं? को जानने में बहुत मदद मिलेगी । हां, उन्हें ही मदद मिलेगी किसान को समझने में जो उससे किंचित लगाव रखते हैं । उनसे लगाव न रखने वालों या नफरत करने वालों को तो मेरे लेख से मदद तो न मिलेगी अलबत्ता उनको मुझ पर और किसानों पर नये सिरे से गुबार निकालने का मौका जरूर मिलेगा । यह तो मैं चाहूंगा भी ।
एक प्रतिक्रिया ----- "ये किसान नहीं हो सकते, ये तो सूट बूट में हैं । " यह अलग बात है कि यही आलोचक जब बदन मे बिना कपड़े या लंगोटी पहन कर किसान आता है आंदोलन में (जैसे तमिलनाडु उदाहरण) तो कहने लगते हैं कि यह किसान है ही नहीं आदि आदि । अब इन आलोचकों की मंशा समझ लेना जरूरी है । इनकी निगाह में किसान वह है जो एकदम फटेहाल हो, घर में भी और बाहर निकले तब भी । इन्हें पता है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी जब बाहर किसी कार्यक्रम में जाता है तो भरसक कुछ कायदे के कपड़े पहन कर ही निकलता है । परन्तु किसानों का चित्र जो इनके मन में कवियों, लेखकों, चित्रकारों ने बैठा दिया है उसके अनुसार तो किसान वही जो हमेशा फटेहाल हो । भले चाहे शादी विवाह, तीज त्यौहार हो पर वह तब भी दीन हीन, मैला कुचैला, अर्ध नग्न, फटे पुराने कपड़ों में ही हो तभी किसान होगा । यह बात नहीं कि इन्हें कोई सहानुभूति है किसान से बल्कि ज्यादातर यह वर्ग उनसे नफरत ही करता है, लगाव तो बहुत दूर की बात है ।
यह वर्ग फिर ऐसा क्यों सोचता है? असल में यह वर्ग किसान को इसी रूप में देखने का आदी है । चाहे चित्र में और चाहे जीवित रूप में । यह सही है कि शहर में जो फुटपाथ मे धंधा करते हैं, अधिकांश किसानों की आय उनसे बहुत कम है और यह भी सही है कि जब वह खेती के कामों में लगा होता है तो पुराने ही कपड़े पहनता है । लेकिन जब आंदोलन करे, किसी कार्यक्रम में जाय तो क्या वह एकाध कपड़े भी शरीर में न डाले! अपने पुराने घावों को कपड़ों मे न छिपाये?! इतना असभ्य तो नहीं है किसान । हमारा अन्नदाता!!! (जिसे इन्हीं लोगों ने यह नाम दिया है, ठगने के लिये)
कुर्ता पैजामा पहन कर किसान आंदोलन करता तो यही आलोचक उसे किसान न कह कर नेता कहते । पैंट शर्ट में है तो भी कहते हैं ---ये किसान हो ही नहीं सकते ये तो पैंट शर्ट में है । अगर नंगे बदन बेचारा किसान आ जाये तो ये ही तरह तरह के गंदा आरोप लगाते हैं । असल मे यह आलोचक वर्ग किसान का वर्गीय शत्रु है । ये किसान को तभी किसान मानेंगे जब वह खेतों में ही मैला कुचैला जी, मर रहा हो और आत्महत्या की कगार पर हो ।
[क्रमश: कई किश्तों में ]
राजकुमार सचान "होरी"
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत
Facebook /Farming with Hori
Subscribe to:
Posts (Atom)
बौद्धिक संघ टीवी -यू ट्यूब चैनेल
बौद्धिक संघ, भारत ने शुरू किया अपना यू ट्यूब चैनेल-- सब्सक्राइब करें और जुड़ें चैनेल से । आप अपने वीडियो भेज सकते हैं चैनेल के लिये ।
-
घरेलू पुस्तकालय योजना घरेलू पुस्तकालय योजना घरेलू पुस्तकालय योजना ************** समाज देवालयों के निकट और पुस्तकालयों से दूर जैसे ...
-
देवालय नहीं पुस्तकालय पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं / यद्यपि अब डिजिटल युग में ज्ञान के नए नए स...
-
वंचित समाज धार्मिक कर्मकांडों और रीति रिवाजों में उलझ कर पीढ़ी दर पीढ़ी मूर्ति पूजा, देवी देवताओं में भटक कर शिक्षा और ग्यान से वंचित...