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Thursday, August 16, 2018

Thursday, June 28, 2018

Monday, June 18, 2018

हिन्दू का मतलब भारतीय, इंडियन

जब हिन्दू कोई धर्म नहीं यह अब सब मानते हैं जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी स्पष्ट कर दिया है तब हिन्दू को धर्म के कालम में लिखना गलत है । धर्म आपका बौद्ध, सिख, ईसाई, सनातन धर्म ,ब्राह्मण धर्म आदि कोई भी हो सकता है । 

        कुछ लोगों का कहना हिन्दू एक हो जाओ या हिन्दू खतरे में है यह सब बकवास है और दिग्भ्रमित करने वाले हैं । जब हिन्दू भारतीय का पर्याय है तब भारतीय तो रहेंगे ही । धर्म कौन रहे  यह बात दीगर है ।
 आइये  हम पुन: चिन्तन करें और देश से भय और भ्रम का वातावरण दूर करें 

Saturday, June 9, 2018

किसानों की गरीबी का एक हल - शहरीकरण

                  किसी भी देश के विकास का एक पैमाना शहरीकरण भी है । जो देश अपना जितना ही शहरीकरण कर चुका होगा वह उतना ही विकसित राष्ट्र की श्रेणी में पहुंच जाता है । उदाहरण के लिये अमेरिका और यूरोप के राष्ट्र अपना 80% तक शहरीकरण कर चुके हैं, यानी वहां ग्रामीण जनसंख्या मात्र 20% या इससे कम है । इसलिए ये सर्वाधिक विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं  ।इसी श्रेणी में कतिपय अन्य देश भी हैं जिनका शहरी करण 80% से अधिक हो चुका है और वे विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आते हैं ।
                  इसी प्रकार शहरीकरण का पैमाना देखते जाइये और अमुक देश विकसित है, विकासशील है या अविकसित आप जान जायेंगे । उदाहरण के लिये चीन । यहां 50% शहरी करण हुआ है तभी अमेरिका से कम विकसित है । इसका 50% ग्रामीण क्षेत्र इसे पीछे की ओर खींचता है । अब   अपने देश के शहरीकरण के आंकड़े देखते हैं । यहां 30%  जनसंख्या शहरी हो पाई है यानी शहरीकरण मात्र 30%  ,अर्थात् 70% ग्रामीण जनसंख्या अपने देश में है । इसलिए शहरीकरण 30% होने से अपने देश के विकास की स्थित क्या है?  विकासशील देश कहेंगे तभी ।
                  अब ग्रामीण जनसंख्या जो यहां 70% है को 30% तक लाने का हमारा लक्ष्य होना चाहिए । यानी कि लगभग 40% जनसंख्या को हमे ग्रामीण से शहरी बनाना है । हम कह सकते हैं कि 70% शहरीकरण के लक्ष्य को पाने के लिये हमे 40% ग्रामीण आबादी को शहरों, कस्बों मे लाना होगा और यहां रोजगार, तथा सुविधाएं सृजित करनी होंगी । इससे भारत के गांवों को विशेषकर किसानों और खेतिहर मजदूरों को बहुत लाभ होगा ।
              खेती मे निर्भरता कम होगी और वहीं खेती अधिक लाभकारी हो जायेगी । किसानों की आज की भयानक स्थिति तो एकदम हल हो जायेगी । ग्रामीण भारत खुशहाल होगा, साथ ही सम्पूर्ण देश का विकास होने पर वह विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जायेगा ।  तब के भारत में एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा । न आंदोलन की बात आयेगी ।
          देश की सरकारों को चाहिए कि प्राथमिकता से देश का शहरीकरण तेजी से करें और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में पहुंचा दें । किसान और समग्र ग्रामीण भारत खुशहाल होगा तथा देश विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ जायेगा ।

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 राजकुमार सचान होरी 
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 

Facebook /Farmer -किसान 

Friday, June 8, 2018

बौद्धिक संघ, भारत : बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय

बौद्धिक संघ, भारत : बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय:             बौद्घिक संघ, भारत  एक स्वैच्छिक सामाजिक बुद्धि जीवियों का संगठन है । इसके अंतर्गत " घरेलू पुस्तकालय योजना " संचालित है...

बौद्घिक क्रांति के जनक -- घरेलू पुस्तकालय

            बौद्घिक संघ, भारत  एक स्वैच्छिक सामाजिक बुद्धि जीवियों का संगठन है । इसके अंतर्गत " घरेलू पुस्तकालय योजना " संचालित है । बौद्घिक संघ, भारत केवल प्रेरणा देने का कार्यक्रम चलाता है जिससे लोग अपने घर, परिवार को ग्यान के प्रकाश से आलोकित कर दें । विभिन्न परिवार तरह तरह के कर्मकांडों, रीतिरिवाजों में उलझ कर बौद्धिक उन्नति से दूर हो जाते हैं जब कि जब कभी वे स्वयं स्कूल, कालेज गये थे तो इन्हीं पुस्तकों के सहारे बढ़े थे । लेखनी थाम कर, कलम पकड़ कर ग्यान के प्रकाश को देखा था,  पर सब भूल गये रोजी रोटी और कर्मकांडों के चक्कर में ।
                 बौद्घिक संघ, भारत यह कभी नहीं कहता कि सारे कर्मकांड बेकार हैं, नहीं करने चाहिये । हां यह जरूर कहता है कि आस्था के नाम पर कुछ भी, कभी भी करने के पहले  वैग्यानिक दृष्टि से भी समझें , तब करें । अनावश्यक समय न बरबाद करें । जिस कलम ने आपको शिक्षा दी, लिखना सिखाया उसको भुला कर न जाने किसकी किसकी पूजा करने लगे, आराधना करने लगे, वन्दना करने लगे । देवी देवताओं का क्या योगदान रहा?  चिन्तन करें तो सही । यह आपकी मान्यताएँ भर हैं । सनातनी धर्म, बुद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाई, सिख सब अलग अलग पूजा पद्धतियों में लगे हैं लेकिन कोई भी धर्म, सम्प्रदाय हो सबकी कलम एक है लेखनी एक है । तो पूजा ही करनी है, वन्दना ही करनी है तो लेखनी की करिये, कलम की करिये । पुस्तकों को घर में सजायिये, पढ़िये । ग्यान लीजिये, दीजिये । "घरेलू पुस्तकालय " बनाइये ।
               क्या करना है जरा सा यह भी समझ लें । जैसे लेखक, कवि के घर में पुस्तकें जरूर होती हैं वैसे ही आप अपने शयन कक्ष, बैठक कक्ष या ड्राइंग रूम में कम से कम एक अलमारी और रैक में कुछ पुस्तकें, पत्रिकायें, समाचार पत्र, यदि हो सके टैबलेट, आईपैड, लैपटॉप, कम्प्यूटर जरूर रखें । एक कलम दान कुछ कलमें रखें और कुछ सादे कागज, रजिस्टर आदि लिखने के लिये । यहां 24 घंटे में कम से कम एक घंटे बैठ कर चिन्तन, पठन, लेखन आदि करें । यही सबसे बड़ी साधना है, उपासना है । फिर भी आप पूजा पाठ करने वाले हैं और बिना उसके अधूरा सा लगता है तो इन पुस्तकों को प्रतिदिन एक दीपक दिखा दें, जला दें, अगर बत्ती जला दें । लेखनी की वन्दना कर दें ।
               ग्यान कांड और कर्मकांड दोनो से गये साथ ही भक्ति कांड भी ।  घर घर पुस्तकालय से बौद्घिक प्रगति तेजी से होगी । नई नई पुस्तकें लिखी जांयेगी, पढ़ी जांयेगी । पुस्तक क्रांति होगी । देश को ग्यान के उच्च शिखर पर ले जाना है तो बौद्धिक संघ, भारत की घरेलू पुस्तकालय योजना को अपनाना है । 
              प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी रुचि के अनुसार, जरूरत के अनुसार पुस्तकें, पत्रिकायें रख सकता है । समय समय पर बदल सकता है । देखते देखते छोटा सा घरेलू पुस्तकालय आपको पाठक से लेखक बना सकता है । आपके व्यवसाय में, नौकरी में चार चांद लगा सकता है । समाज मे एक सम्मान जनक स्थान दिला सकता है । एक बौद्घिक क्रांति ला सकता है । घर घर में हुई बौद्घिक क्रांति पूरे समाज, देश में बौद्धिक क्रांति पैदा कर देगी । 
             
         जय हिन्द!  जय भारत!!  जय बौद्घिक संघ  !!! 
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राजकुमार सचान "होरी "
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 

Facebook /bauddhiksangh 

Thursday, June 7, 2018

किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर (भाग2)

          किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर --लेख के प्रथम भाग में इस बात का उत्तर दिया था कि आंदोलन करने वाले किया तो सूट बूट में हैं । इसी को आगे बढ़ाते हैं  । कुछ देखने वालों ने यहां तक कहा कि आंदोलनकारी बड़ी बड़ी गाड़ियों में आये ये किसान नहीं हो सकते । ये नेता हैं जो विपक्षी पार्टी के हैं । 
              दुनियांमे बहुत सारे आंदोलन होते हैं जिनमे आंदोलन करने वाले तो होते ही हैं साथ में उनसे सहानुभूति रखने वाले भी आ जाते हैं । यह किसानों के आंदोलन में भी हो रहा है । पर कुछ शहरी, कुछ सत्ता के पक्षधर ऐसे पेश आये किसानों से कि सिद्ध हो गया कि उनको कथित अन्नदाता से सहानुभूति तो दूर बल्कि नफरत यहां तक है कि जो उनसे सहानुभूति व्यक्त करने जायें वे भी बुरे । क्या किसान जिसको दिखावटी ही सही तुम अन्नदाता कहते हो को बुरे दिनों में, संघर्ष में साथ देना बुरा है?  पाप है?   
                 होना तो यह चाहिये था कि जिसको देश अपना अन्नदाता मानता है उसे आंदोलन ही न करना पड़ता और अगर करना पड़ा तो सत्ता पक्ष और विपक्ष आगे आ कर बढ़ चढ़ कर साथ देता । कम से जो मजाक उड़ाया गया, भावनात्मक चोट पहुंचायी गयी वह तो न होता । क्या जो आंदोलन में साथ दे रहे थे और किसान नहीं थे कोई कानून है कि वे साथ देने नहीं आ सकते थे?  या अगर आते भी तो पैदल आते अपनी मोटरसाइकिल, कार, बस से न आते??  यह सोच गिरावट की पराकाष्ठा है । किसान का लगता है कोई नहीं । उसके संगठनों में ताकत नहीं । 
                आंदोलन की एक अन्य प्रतिक्रिया है कि सच्चा किसान अपनी सब्जियां, दूध, अनाज सड़कों पर फेंक नहीं सकता । ये किसान हो ही नहीं सकते । ये फर्जी हैं । किसी न किसी राजनैतिक दल के लोग हैं, नेता हैं । सामान्य दिनों मे किसान ही क्या कोई भी अपनी खून पसीने की कमाई बरबाद नहीं कर सकता, सड़कों में फेंक नहीं सकता । परन्तु आलोचना करने वाले यह भूल गये कि किसान की आमदनी न होने से कितना पीड़ित है, दुखी है । हर साल हजारों की संख्या में आत्महत्या करता है तो क्या ऐसी भयंकर स्थिति में वह कुछ भी उन्माद में नहीं कर सकता?  
          उन्माद में व्यक्ति तो सब होश हवास भूल कर पहले अपने प्यारे बच्चों को, पत्नी को मार कर खुद भी आत्महत्या कर बैठता है ।  ये तो केवल अपना सामान सड़कों में फेंकना तक था । एक किसान एक जगह अनशन पर बैठा और मर गया । यह क्या है  ? अरे शहरी बाबुओं, किसान विरोधियों!  कुछ तो लिहाज करो,  शर्म करो, अगर किसान का पैदा किया हुआ कुछ भी खाते हो । किसान की हाय से बचो ।  जिस देश ने अपने किसानों, अन्नदाताओं का पेट नहीं भरा वह कभी पनप ही नहीं  सकता । देश के किसान को उसकी फसल का पैसा न दे कर विदेश से अनाज, सब्जियां, चीनी आदि खरीद कर किसान के पेट मे लात मारना कभी किसी के लिए सुखकर नहीं हुआ । 
           किसानों की पीड़ा सरकारें समझें तो पर दलगत राजनीति और शहरी समाज समझने नहीं देता जिनको किसानों का दु:ख, दर्द बनावटी और ढोंग लगता है । किसानों के पास आज कोई टिकैत नहीं है । आंदोलन तो आज नहीं कल खत्म होगा ही पर किसान के विरोधियों  ! अपने लिये नर्क मत तैयार करो । किसान से भी यही विनती है कि वह देखे कि घाटे की खेती कब तक करेगा?  शहरी तो एक दो साल भी खेती न करेगा जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी वह कर रहा है  ,मर रहा है  । ----------------

 ( क्रमश: आगे जारी)  

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 राजकुमार सचान होरी 
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 


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