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Monday, May 7, 2018

घरेलू पुस्तकालय योजना

घरेलू पुस्तकालय योजना
घरेलू पुस्तकालय योजना
घरेलू पुस्तकालय योजना

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    समाज देवालयों के निकट और पुस्तकालयों से दूर जैसे जैसे होता गया पिछड़ता गया । उसके अन्दर की क्रांति ज्वाला भी बुझती गयी । भाग्यवादी, ईश्वरवादी और बहुदेववादी होता गया ।बौद्घिक सत्ता से दूरी ही हमारा मूल मर्ज है ।
               बौद्घिक संघ, भारत  के इस अभियान मे शामिल हो कर और अधिक से अधिक लोगों को शामिल कर हम उसे पथप्रदर्शक बना सकते हैं । ग्यान, विग्यान ही हमारा मोक्ष कर्ता होगा । आप इसकी शुरुआत अपने घर से करें । आपका बैठक कक्ष, ड्राइंग रूम या और कक्ष "घरेलू पुस्तकालय " बन जायेंगे अगर कुछ पुस्तकें, पत्रिकायें रैक, अलमारी आदि में रखने लगें और हम सदा निश्चय रखें कि भले ही एक घंटा ही सही प्रतिदिन वहां बैठ कर कुछ पढ़ेंगे । जो मन करेगा लिखेंगे और उसे छपने को भेजेंगे, सोशल मीडिया में पोस्ट करेंगे । आसपड़ोस लोगों से चर्चा कर बौद्घिक कार्यों को और करेंगे । भांति भांति की उपयोगी पुस्तकें एकत्रित करेंगे ।
              हम आप सोशल मीडिया में जितना लिखते हैं उसका संकलन भी पुस्तकालय में रखेंगे और उसको किताबों के रूप में भी लायेंगें । देखते देखते आपको लेखक की पहचान और सम्मान मिलने लगेंगे और समाज को मिल जायेगा एक नया लेखक, कवि, चिन्तक, बुद्धि जीवी ।
             आपके समाज में कलमकारों की ही तो कमी है । इस तरह जहां इनका कमी दूर हुई समाज पिछड़ेपन के अभिशाप से मुक्त होने लगेगा । एक उदाहरण से समझाता हूं ---- कायस्थ शूद्र मे आते हैं पर उन्होने बहुत पहले लेखनी के महत्व को पहचाना और स्थिति यह है कि उनमे कोई पिछड़ा नहीं । सब ब्राह्मण के समकक्ष हर क्षेत्र में ।
               घरेलू पुस्तकालय योजना से बौद्घिक संघ के सिपाही समाज में बदलाव लायेंगें, क्रांति करेंगे । पीढ़ी दर पीढ़ी का रोना बन्द होगा । निर्माण हमारा ध्येय है ---समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, गीत संगीत, कलाओं, पोर्टलों, चैनलों आदि आदि बौद्धिक कार्यों का निर्माण । ग्यान की मशाल ले कर फिरने वाला समाज ।     
        आप डाक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, कर्मचारी, अध्यापक, नेता, मजदूर किसान ,व्यवसाई  कुछ भी हो सकते हैं पर अपने पेशे के साथ साथ लेखनी या अन्य कलाओं के बौद्धिक कार्यों को कर सकते हैं । बौद्घिक संघ यही तो चाहता है ।     आप पुराने उत्पीड़न के बार बार जिक्र करने मे समय क्यों बरबाद करें, नया करें खुद बदलें लोगों को बदलें ।
         पूजा करना ही है तो काल्पनिक देवी देवताओं, ईश्वर के स्थान पर वास्तविक और साक्षात लेखनी की करें । अपने कक्ष में रोज लेखनी पूजन करें । मेरे विचार से लेखनी पूजन है ज्यादा से ज्यादा लेखनी का प्रयोग जिसे हम सबने नौकरी या व्यवसाय पाने के बाद लगभग छोड़ दिया है । या किसान मजदूर संवर्ग जिसने लेखनी पकड़ी ही नहीं, पकड़ी भी तो जल्दी छोड़ दी  । तभी समाज का यह बड़ा हिस्सा सबसे ज्यादा गरीब, पद दलित, पिछड़ा हो गया है ।
             आइये "घरेलू पुस्तकालय "योजना में अपना अपना योगदान दें और वहां से शुरू करें प्रकाश । "तमसो मा ज्योतिर्गमय " या "अप्प दीपो भव " ही समाज को पिछड़ेपन के कलंक से सदा के लिये दूर कर देंगे और राष्ट्र की मुख्य धारा में चलने लगेंगे।
      मैं हमेशा कहता हूं --बौद्घिक क्रांति ---- सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्रांति की जननी है।
पुस्तकालय, वाचनालय ही इस बौद्घिक क्रांति के केंद्र बनेंगे । आइये देश में इनकी श्रृंखला बनायें ।
             
         जय बौद्घिक क्रांति
         जय बौद्घिक क्रांति

        जय बौद्घिक संघ
        जय बौद्घिक संघ

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राजकुमार सचान "होरी"
राष्ट्रीय अध्यक्ष -बौद्घिक संघ, भारत
www.bauddhiksangh.com

1 comment:

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