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Wednesday, June 6, 2018

किसानों के लिये अर्ज किया है

       वे   जानते हैं कि घाटा ही घाटा है खेती में, 
       तभी तो शहरी लाट साहब खेती नहीं करते ।

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      कभी किसान पहने हो सलीके से कपड़े,
     शहरी बाबुओं के सीने में  सांप लोट जाते हैं ।

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     तू फटेहाल रह, कर चाहे खेतों में खुदकुशी, 
     होरी यही नियति है ,तू भारतीय किसान है ।

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       तेरे संघर्षों में साथ दे कोई गवारा नहीं, 
     अजीब लोग हैं ये, ये ही अन्नदाता कहते हैं ।

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 राजकुमार सचान "होरी "
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 

    
   

Tuesday, June 5, 2018

बौद्धिक संघ, भारत : देवालय नहीं, पुस्तकालय

बौद्धिक संघ, भारत : देवालय नहीं, पुस्तकालय:                         देवालय नहीं पुस्तकालय                  पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं / यद्यपि अब डिजिटल युग में ज्ञान के नए नए स...

किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर




              इस बार का किसान आंदोलन हो या किसी समय का उस पर कैसी कैसी प्रतिक्रियायें होती हैं, यह देखना, समझना बहुत जरूरी है और अनिवार्य भी । इन प्रतिक्रियाओं की मूल भावना से आपको किसान का दु:खद जीवन क्यों है और उसकी समस्यायें बदस्तूर क्यों बनी हुई हैं?  को जानने में बहुत मदद मिलेगी । हां, उन्हें ही मदद मिलेगी किसान को समझने में जो उससे किंचित लगाव रखते हैं । उनसे लगाव न रखने वालों या नफरत करने वालों को तो मेरे लेख से मदद तो न मिलेगी अलबत्ता उनको मुझ पर और किसानों पर नये सिरे से गुबार निकालने का मौका जरूर मिलेगा । यह तो मैं चाहूंगा भी ।
                  एक प्रतिक्रिया ----- "ये किसान नहीं हो सकते, ये तो सूट बूट में हैं । " यह अलग बात है कि यही आलोचक जब   बदन मे बिना कपड़े या लंगोटी पहन कर किसान आता है आंदोलन में (जैसे तमिलनाडु उदाहरण)  तो कहने लगते हैं कि यह किसान है ही नहीं  आदि आदि ।   अब इन आलोचकों की मंशा समझ लेना जरूरी है । इनकी निगाह में किसान वह है जो एकदम फटेहाल हो, घर में भी और बाहर निकले तब भी । इन्हें पता है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी जब बाहर किसी कार्यक्रम में जाता है तो भरसक कुछ कायदे के कपड़े पहन कर ही निकलता है । परन्तु किसानों का चित्र जो इनके मन में कवियों, लेखकों, चित्रकारों ने बैठा दिया है उसके अनुसार तो किसान वही जो हमेशा फटेहाल हो । भले चाहे शादी विवाह, तीज त्यौहार हो पर वह तब भी दीन हीन, मैला कुचैला, अर्ध नग्न, फटे पुराने कपड़ों में ही हो तभी किसान होगा । यह बात नहीं कि इन्हें कोई सहानुभूति है किसान से बल्कि ज्यादातर यह वर्ग उनसे नफरत ही करता है, लगाव तो बहुत दूर की बात है । 
                यह वर्ग फिर ऐसा क्यों सोचता है?   असल में यह वर्ग किसान को इसी रूप में देखने का आदी है । चाहे चित्र में और चाहे जीवित रूप में ।  यह सही है कि शहर में जो फुटपाथ मे धंधा करते हैं, अधिकांश किसानों की आय उनसे बहुत कम है और यह भी सही है कि जब वह खेती के कामों में लगा होता है तो पुराने ही कपड़े पहनता है । लेकिन जब आंदोलन करे, किसी कार्यक्रम में जाय तो क्या वह एकाध कपड़े भी शरीर में न डाले!  अपने पुराने घावों को कपड़ों मे न छिपाये?!  इतना असभ्य तो नहीं है किसान । हमारा अन्नदाता!!! (जिसे इन्हीं लोगों ने यह नाम दिया है, ठगने के लिये)  
               कुर्ता पैजामा पहन कर किसान आंदोलन करता तो यही आलोचक उसे किसान न कह कर नेता कहते । पैंट शर्ट में है तो भी कहते हैं ---ये किसान हो ही नहीं सकते ये तो पैंट शर्ट में है । अगर नंगे बदन बेचारा किसान आ जाये तो ये ही तरह तरह के गंदा आरोप लगाते हैं । असल मे यह आलोचक वर्ग किसान का वर्गीय शत्रु है । ये किसान को तभी किसान मानेंगे जब वह खेतों में ही मैला कुचैला जी, मर रहा हो और आत्महत्या की कगार पर हो ।
      [क्रमश:  कई किश्तों में ] 
       राजकुमार सचान "होरी"
राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 
Facebook /Farming with Hori 

Monday, June 4, 2018

अन्नदाता कह कर ठगा गया

             अन्नदाता कह कर ठगने का काम हुआ है किसानों को इस देश मे सदियों से । इतिहास के किसी काल को देखिये किसान की माली हालत ठीक नहीं रही । अंग्रेजों के समय सबसे अधिक किसान की हालत खराब हुई  । तत्कालीन समय के किसानों की इतनी दुर्दशा थी कि वह भिखारी की श्रेणी में पहुंच गया था । जमीदारों ने तो उसकी रीढ़ ही तोड़ दी थी ।  पर इसी काल मे कुछ कवियों ने उसको बेवकूफ बनाया यह कह कर कि ------ उत्तम खेती मध्यम बान । निषिध चाकरी भीख निदान ।। जिन कवियों ने यह लिखा उनके परिवारों ने कभी खेती नहीं की पर सत्ता के साथ साजिश करके ऐसे लोगों ने किसानों के अंदर के विद्रोह को कम किया । बेचारा किसान हाड़ तोड़ मेहनत करता रहा और भुलावे में रहा कि उत्तम खेती है ।  
               एक और शब्द किसान के लिए गढ़ा गया --- 'अन्नदाता' । वह इस शब्द के माध्यम से व्यवस्था से फिर ढगा गया । वह स्वतंत्र भारत में भी भूखों मरता रहा,  आत्महत्या करने को विवश होता रहा पर अन्नदाता नाम से खुश हो कर खेती में मरता खपता रहा । अन्नदाता किस बात का खुद और उसका परिवार अन्न, और जरूरी रोटी कपड़ा, मकान के लिये रोये लेकिन अन्नदाता बना रहे ।
            एक और नारा उसे ठगने के लिये दिया गया कि --- जय जवान, जय किसान । जब कि सत्ता ने किसानों और जवानों की उपेक्षा ही की ।  क्या 70 साल काफी नहीं थे किसानों की माली हालत ठीक करने के लिए?  किसानों की लागत बढ़ती गयी पर विक्री मूल्य इतना ही बढ़ा कि खेती की आमदनी कम होती रही जिससे किसान बुरी दशा में आता गया । इस देश की सत्ता का चरित्र शहरी रहा है और अभी भी है, उसने किसानों के लिये दिल से कभी काम किया ही नहीं  । बस वोटों के लिये एक रश्म अदायगी भर होती रही । 
     एक तो सरकारों को चाहिए कि कृषि पर जनसंख्या का भार कम करे । आज 30% जनसंख्या का बोझ ही कृषि उठा सकती है पर है 70%  ,यह 40% का अतिरिक्त भार खेती से शीघ्र कम करना जरूरी है ।  दूसरा उपाय मार्केटिंग को आधुनिक डिजिटल बनाना । किसानों से उपभोक्ता के बीच मे सरकारी और गैर सरकारी बिचौलियों की भरमार है और ये सारे किसानों को मिलने वाले पैसे की बन्दरबांट करते आये हैं । मंडी समितियों का ढांचा किसान हितैषी कभी नहीं रहा ।  मंडियों में आढ़ती, बिचौलिये पूल कर लेते हैं और किसान के उत्पाद को बहुत कम पैसों में नीलामी होने देते हैं । अक्सर किसान को अपनी सब्जियों का भाड़ा तक नहीं मिलता और वह मजबूर हो कर अपना सामान लागत से भी आधी, चौथाई कीमत में बेच जाता है या फिर सारी सब्जियां या अन्य उत्पादन गुस्से में फेंक कर चला जाता है । यह घटनायें आम हैं । आज किसानों की हड़ताल के समय जब ये शहरी ,किसान को दूध, सब्जियां सब्जियां सड़कों में फेंकते हुये देखते हैं तो आश्चर्य होता है या ये किसानों पर मूर्खता पूर्ण आरोप लगाते हैं  ।
         आज आवश्यकता यह है कि हम किसान को बेवकूफ बनाना बन्द करें । अन्नदाता कह कर या जय जवान जय किसान कह कर हम उसे बहुत ठग चुके हैं ।  लागत का निर्धारण जब तक सरकारों में बैठे शहरी बाबू करेंगे तब तक किसानों का यही हाल रहेगा ।  अभी समय है सरकारी, शहरी बाबुओ चेत जाओ अन्यथा किसानों को  अगर मरना आता है तो तुम्हारा दाना पानी बन्द करना भी आता है ।

     राजकुमार सचान होरी 
   राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 
www.bauddhiksangh.com 

Sunday, June 3, 2018

किसान का भला हो तो कैसे?

       सत्ता को दलीय आधार के अलावा एक अन्य आधार पर देखेंगे तब किसानों की दुर्दशा 1947 के बाद की ही नहीं अपितु पहले की भी समझ जायेंगे । आइये सत्ता का चरित्र समझते हैं । सत्ता के चार स्तम्भों को एक एक कर समझते हैं । 
       पहले कार्यपालिका जिसमें कर्मचारी और अधिकारी आते हैं । इस वर्ग में शहरों में रहने वाले परिवारों से काफी संख्या में आते हैं जो कभी कभार गांव गये भी होंगे तो पिकनिक मनाने ।फिर जब सरकारी सेवाओं या प्राइवेट सेवाओं मे आये तो इनको न गांव का अनुभव होता है न ही विशेष लगाव । ग्रामीण विकास इनके लिए बस सरकारी कर्तव्य भर होता है जिसमें इनकी रुचि आंकड़े बनाने, गिनाने,दिखाने मे ज्यादा होती है । इनके शहरी परिवारों का वातावरण भी कभी किसानों से सहानुभूति का नहीं रहा तो ये किसान हितैषी संस्कार कहां से पाते । इस वर्ग में दूसरे वे हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों से आये तो हैं पर सब के सब सेवा काल में किसी न किसी कस्बे, नगर या महानगर में रहने लगे । यद्यपि ये किसानों की योजनाओं में दूसरों की अपेक्षा मन अधिक लगाते हैं परन्तु धीरे धीरे शहरी वातावरण में रहते रहते ये भी गांवों और किसानों व कृषि मजदूरों के लिये बाहरी से होने लगते हैं । ये लोग 100% क्या 50% दे लें तो बड़ी बात । इनकी कोशिश यही रहती है कि इनके परिवार में जो गांव में रह गये हैं उन्हें भी शहरों में ले आयें । समस्त कार्यपालिका किस तरह और कितना ग्रामीण और किसान हितैषी बचता है  आप खुद जान सकते हैं ।
         अब विधायिका पर चर्चा करते हैं । यद्यपि विधायकों, सांसदो की सीटें शहरी से अधिक ग्रामीण हैं । पर यह देखना बड़ा तर्क संगत है कि जो शहरी क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि हैं वे तो किसानों, ग्रामीणों के लिये कान, आंख बन्द रखते ही हैं लेकिन जो ग्रामीण क्षेत्रों के जन प्रतिनिधि हैं वे भी केवल वोट मांगने, शादी विवाह, गमी मे ही वहां जाते हैं या फिर किसी दुर्घटना में बस । शिलान्यास, उद्घाटन के समय को छोड़ दें तो किसानों, गांवों से इनका कुछ लेना देना नहीं । ऐसा क्यों होता है?  ये सारे के सारे जनप्रतिनिधि गांवों में न रहकर शहरों मे रहने लगते हैं, इनका परिवार शहरों में बस जाता है और ये गांवों मे बस अधिकारियों की तरह ही दौड़ा करने भर जाते हैं । अलबत्ता ये गमी, शादी, विवाह इसलिए नहीं छोड़ते हैं कि उसी से इनका वोट बैंक बनता है । यह आदत और तरीका हर पार्टी के नेता का होता है तो किसान, ग्रामीण करे तो क्या करे?  सारी की सारी विधायिका एकसी । ये कभी इसको हराते हैं कभी उसको पर जन प्रतिनिधि तो सारे के सारे शहरी मिट्टी के बन जाने के कारण इनके लिए घड़ियाली आँसू ही बहाते हैं । इस तरह किसान और ग्रामीण विधायिका से लगातार ठगा जाता है ।
         न्यायपालिका और मीडिया को एक साथ लेते हैं । न्यायपालिका का चरित्र तो हमेशा शहरी रहा कार्यपालिका की तरह ही । ये किसी न किसी शहर में रहते हैं और रिटायर होने पर भी नगरों में ही बस जाते हैं । ग्रामीण बेचारा तो हो सकता है पर उसके लिए समय ही कहां । कार्य भी शहरों में और कार्य के बाद भी शहरी जीवन । कहां किसानों, ग्रामीणों की समस्याओं से आमना सामना पड़ता है । अधिक से अधिक मुवक्किल के रूप में किसान, गांव वाला दिख गया । बोल वह भी नहीं सका वकील साहब जो हैं जिनका सबसे बड़ा काम तारीख पर तारीख लेना भर होता है । अब चतुर्थ स्तम्भ -मीडिया की बात कर लें । इसका तो इतना शहरी चरित्र होता है कि अगर गांवों मे आपदायें न आयें, किसान आत्महत्या न करें, देशी शराब पीकर ग्रामीण न मरें, गांव की बालिकाओं से बलात्कार न हो तो समाचार ही न बने । या फिर नेता या अधिकारी का दौड़ा हो जाये तो प्रायोजित मीडिया रहेगा ही ।
           सत्ता के चारो पाये शहरी थे, हैं और सम्भावना है कि रहेंगे भी ।  जब तक सत्ता का चरित्र नहीं बदलेगा बहुत उम्मीद इस व्यवस्था से नहीं है । इसलिए किसानों, ग्रामीणों का उत्थान हो, विकास हो, आमूलचूल परिवर्तन करना होगा । अगर एक ही कदम उठा लिया जाय कि ये चारो वर्ग अपनी सेवाकाल का आधा समय गांव में रहेंगे या इसी तरह का कोई उपाय तो फिर देखिये गांवों, किसानों का भाग्य बदल जाये ।
     
       राजकुमार सचान होरी 
  राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत 
www.bauddhiksangh.com

Saturday, June 2, 2018

बौद्घिक संघ, भारत के ब्लाग लेखक बने

बौद्घिक संघ, भारत के ब्लाग लेखक बने । आप दी गई ईमेल पर लेख, विचार, रचनायें ,बौद्घिक गतिविधियां भेजें ----- rajkumarhori.bauddhiksangh@blogger.com 

Friday, June 1, 2018

देवालय नहीं, पुस्तकालय


                       देवालय नहीं पुस्तकालय 

                पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं / यद्यपि अब डिजिटल युग में ज्ञान के नए नए साधन आ गए हैं ,लेकिन आज भी पुस्तकों का अपना विशेष स्थान है /बचपन से आरम्भ कर हम अंत समय तक किसी न किसी रूप में पुस्तकों के साथ रहते हैं / प्रत्येक घर में बौद्धिक विकास के लिए पुस्तकों तथा ज्ञान के अन्य साधनों का होना बहुत जरूरी है /  शिक्षा ही पशु से हमें मनुष्य बनाती है /

                    हजारों सालों से जो परिवार शिक्षा से दूर रहे वे ही जीवन की दौड़ में पिछड़ गए / स्वतंत्र भारत में जब शिक्षा सब के लिए  सुलभ है तो हमें चाहिए कि इसे जरूर गृहण  करें / इतना ही  नहीं शिक्षित हो कर किसी रोजगार में लगने के बाद भी शैक्षिक और बौद्धिक कार्य अवश्य करते रहें जैसे समाचार पत्र ,पत्रिकाएं निकालना ,न्यूज़ पोर्टल ,चैनल स्थापित करना , पुस्तकें लिखना आदि आदि कार्य /

                ज्ञान का भण्डार घर घर स्थापित करने के लिए एक घरेलू पुस्तकालय हर घर बनाया जाय / अपने शयन कक्ष या ड्राइंग रूम में रैक  और अलमारी में कुछ जरूरी पुस्तकें , पत्रिकाएं रखें।  सोसल मीडिआ में भी सक्रिय रहें और दुनिया भर से विचारों और ज्ञान का आदान प्रदान करें / अब आपका यह घरेलू पुस्तकालय बहुत बड़ा देवालय बन जाएगा / पूरे परिवार में संस्कार आ जाएंगे और सभी इसको ही देवालय मानने लगेंगे / बाहर देवी देवता ,ईश्वर की तलाश की जरूरत समाप्त / अगर आप ईश्वरवादी हैं तो आपका ईश्वर इसी कक्ष में है / आप देवी देवता मानते हैं तो लेखनी की आराधना करिये जिस के द्वारा ज्ञान मिला है / 

              देखते देखते आप और आपका परिवार झूठे कर्मकांडों से बचेगा / पूजा स्थलों में नाहक दान दक्षिणा से बचेगा और पण्डे पुजारियों के मकड़जाल से भी मुक्त होगा /  फिर क्या आपका समाज शैक्षिक और बौद्धिक रूप से आगे निकल जाएगा और राष्ट्र की मुख्य धारा में आ जाएगा / इस सब से जब पिछड़े ,दलित समाज ऊपर उठेंगे तब देश का समग्र विकास होगा और भारत दुनियाँ में विश्व गुरू फिर से बनेगा /

                तो देर किस बात की बौद्धिक संघ ,भारत से जुड़िये और अपने घर में स्थापित करिये एक घरेलू पुस्तकालय / याद रखिये "देवालय नहीं , पुस्तकालय "


                 राज कुमार सचान "होरी"

           राष्ट्रीय अध्यक्ष ,बौद्धिक संघ भारत        www.bauddhiksangh.com  , email  bauddhiksangh@gmail.com whats app 9958788699

www.bauddhiksangh.com

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