आप अपने को मूल निवासी ,वंचित समाज, पिछड़ा ,दलित वर्ग कहते हैं पर क्या सोचा है कभी कि 1947 के बाद भी आप मीडिया में कुछ अपवाद छोड़ कर आप गये ही नहीं । मीडिया आपकी खबरें नहीं दिखाता, आपके बारे ने लिखता नहीं ,ये आरोप तो लगाते रहे पर मीडिया मे जाने के बजाय खेती किसानी में मरते रहे । आज भी स्थिति यही है और इसके लिए दोष ब्राह्मणवाद को देंगे ।
हद है मूर्खता की । 85% जनता के पास मीडिया में 1% हिस्सेदारी भी नहीं है । लघु समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तक को आप एकाध छोड़ दें तो निकालते नहीं । न्यूज पोर्टल न के बराबर । जब कहा जाता है कि भाई खेती जो पढ़ लिख गये हैं वे छोड़ दें तो उपदेश देंगे कि खेती नहीं करेंगे तो देश खायेगा क्या? खुद भले भूखों मरे पीढ़ी दर पीढ़ी ।
मीडिया वह क्षेत्र है जो प्रजातन्त्र को नियंत्रित करता है पर आप नहीं जायेंगे । एक वर्ष से बौद्घिक संघ, भारत कोशिश में लगा है पर व्यर्थ । इन समाजों के बड़े नेता, धनपति सब कूप मंडूकता में लगे रहेंगे । सरकार तो बना लेंगे पर मीडिया क्रियेट नहीं करेंगे ।
ये समाज बड़े ही रूढ़ और जंग लगे हैं । इन पर बौद्धिक कार्यक्रमों के लिये तो जूं तक नहीं रेंगती ।
कवि, लेखक भी वंचित समाज में नहीं के बराबर हैं पर जो हैं भी वे इन वर्गों के लिये तो शायद ही कभी कलम चलाते हों । सालों साल कोई किताब नहीं । दूसरों की किताबें पढ़ेंगे और रोयेंगे कि इनमे तो उनके खिलाफ लिखा है । अरे मूर्खो, खुद क्यों नहीं लिखते हो? बस सेवा कार्यों मे लगे रहो और कहलाएं शूद्र । सेवा कार्य छोड़ कर शैक्षिक और बौद्घिक कार्यों को करें तब देखें कि क्रांति हुई कि नहीं??
राजकुमार सचान होरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
बौद्घिक संघ, भारत
www.bauddhiksangh.com
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